मूत्र में शर्करा की जांच

उद्देश्य

हमारा उद्देश्य मूत्र के दिए गए नमूने में शर्करा की उपस्थिति का पता लगाना है।

सिद्धांत

शरीर में अलग-अलग चयापचय प्रक्रियांए बड़ी मात्रा में वाष्पशील और गैर वाष्पशील अपशिष्ट उत्पादों का निर्माण करती है। मूत्र जंतु  और मानव शरीर में बनने वाला एक तरल गौण उत्पाiद होता है। इसका निर्माण गुर्दे में मूत्रण नामक प्रक्रिया के माध्यम से होता है और मूत्रमार्ग के माध्यम से बाहर निकलता है। मूत्रण शरीर से पानी में घुलनशील रसायनों को बाहर निकालने का प्राथमिक तरीका है।

चलिए , मूत्र की कुछ विशेषताओं पर चर्चा करते हैं।

यूरोक्रोम नामक पीले पिगमेंट की उपस्थिति के कारण सामान्य मूत्र आम तौर पर हल्का पीले रंग का होता है। वयस्क मनुष्यों में मूत्र का औसत उत्पादन प्रति दिन 2 लीटर होता है। यह अलग-अलग परिस्थितियों पर  निर्भर करता है । मूत्र का पीएच 4.6-8 के बीच अलग-अलग होता है और मूत्र का विशिष्ट गुरुत्व 1.010-1.40 के बीच होता है।

चलिए अब देखते हैं कि मूत्र के घटक क्या हैं?

मूत्र के सामान्य संघटक

असल में, सामान्य मूत्र कार्बनिक और अकार्बनिक पदार्थों का अत्यधिक जटिल जलीय विलयन (साल्यूशन) होता है। मूत्र में लगभग 95-96% पानी होता हैं। मूत्र में मौजूद सबसे महत्वपूर्ण नाइट्रोजनयुक्त कार्बनिक पदार्थ यूरिया, यूरिक एसिड और क्रिएटाइन होता हैं। अन्य कार्बनिक पदार्थों में आक्जेंलिक एसिड और लैक्टिक एसिड होते हैं। मूत्र के प्रमुख अकार्बनिक घटक सोडियम क्लोराइड, पोटेशियम क्लोराइड, सल्फेट और फॉस्फेट हैं।

मूत्र के असामान्य घटक

शर्करा (ग्लूकोज), कीटोन बॉडीज, रक्त, प्रोटीन और पित्त मूत्र के असामान्य घटक हैं। आमतौर पर, ग्लूकोज सामान्य मूत्र में अनुपस्थित रहता है। लेकिन जब रक्त में ग्लूकोज का स्तर ग्लूकोज की वृक्कीय सीमा (160-180 मिलीग्राम / डीएल) से ज्यादा हो जाता है, तो ग्लूकोज मूत्र में आने लगता है। मूत्र में ग्लूकोज की उपस्थिति को ग्लूकोसुरिया कहा जाता है और आमतौर पर डायबिटीज मेलीटस का यह संकेत होता है।

आम तौर पर मूत्र के नमूने में शर्करा की उपस्थिति का परीक्षण करने के लिए निम्नलिखित दो परीक्षणें का इस्तेमाल किया जाता हैं।

  • बेनेडिक्ट परीक्षण
  • फेलिंग परीक्षण

बेनेडिक्ट परीक्षण में, रीजेंट (अभिकर्मक) के रूप में बेनेडिक्ट विलयन (साल्यूशन) का प्रयोग किया जाता है। बेनेडिक्ट रीजेंट (अभिकर्मक) सोडियम कार्बोनेट, सोडियम साइट्रेट और कॉपर (II) सल्फेट पेंटाहाइड्रेट (CuSO4.5H2O) का संयोजन होता है। फेलिंग परीक्षण में, फेलिंग विलयन (साल्यूशन)-ए और फेलिंग विलयन (साल्यूशन)-बी का रीजेंट (अभिकर्मक) के रूप में इस्तेमाल किया जाता हैं। फेलिंग विलयन (साल्यूशन)-ए नीले रंग वाले कॉपर (II) सल्फेट का जलीय विलयन (साल्यूशन) होता है, जबकि फेलिंग विलयन (साल्यूशन)-बी सोडियम पोटेशियम टारट्रेट का स्पष्ट रंगहीन जलीय विलयन (साल्यूशन) होता है।

रीजेंट (अभिकर्मकों) के साथ मूत्र का नमूना उबलने पर बेनेडिक्ट के विलयन (साल्यूशन) और फेलिंग विलयन (साल्यूशन) में मौजूद कॉपर (II) सल्फेट (CuSO4) और  क्युप्रस ऑक्साइड के रंगीन अवक्षेप(प्रसीपिटेट) का निर्माण करने के लिए अपचायक एजेंट ग्लूकोज से अपचयित होता है।

ग्लूकोज की सांद्रता के आधार पर क्युप्रस ऑक्साइड के हरे, पीले और लाल अवक्षेपों (प्रेसिपिटेट) का निर्माण होता हैं। ग्लूकोज के स्तर की सांद्रता के आधार पर रंगों का अनुक्रम दिखाने वाली तालिका नीचे दी गई है।

              रंगीन अवक्षेप(प्रसीपिटेट)

              चीनी मौजूद का प्रतिशत

      नीला           शर्करा अनुपस्थित
       हरा               0.5 से 1% 
      पीला              1 से 2 % शर्करा
      कत्‍थई              2 % या ज्‍यादा शर्करा

सीखने के परिणाम

  • छात्र मूत्र की विशेषताएं समझते हैं।
  • छात्र मूत्र के सामान्य और असामान्य घटकों को समझते हैं।
  • छात्र मूत्र के नमूने में शर्करा की उपस्थिति का पता लगाने का परीक्षण समझते हैं।
  • एक बार जब छात्र एनीमेशन और सिमुलेशन के माध्यम से चरणों को समझ लेंगें तो वे वास्तविक प्रयोगशाला में और ज्यादा सटीक प्रयोग कर पांएगें।

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