परासरण (ऑसमोसिस) का अध्ययन

उद्देश्य

हमारा उद्देश्य पोटैटो ऑस्मोमीटर का उपयोग करके परासरण (ऑसमोसिस) का अध्ययन करना है।

सिद्धांत

परासरण (ऑसमोसिस)  क्या है?

परासरण (ऑसमोसिस) वह प्रक्रिया है जिसमें विलायक (साल्वेंट) अणु अर्धपारगम्य झिल्ली (मेम्बेरेन) के माध्यम से उच्च सांद्रता वाले क्षेत्र से कम सांद्रता वाले क्षेत्र की ओर तब तक जाते है जब तक कि अर्धपारगम्य झिल्ली (मेम्बरेन) के दोनों ओर तरल पदार्थ की मात्रा बराबर नहीं हो जाती है। 

अर्धपारगम्य  झिल्ली (मेम्ब्रेन) के माध्यम से होकर गुजरने वाले तरल पदार्थ, विलायक (साल्वेंट)  के रूप में जाना जाता है। जबकि तरल पदार्थ में घुले हुए पदार्थ को विलेय (सॉल्यूट) के रूप में जाना जाता है और साल्वेंट (विलायक) और विलेय (सॉल्यूट) का मिश्रण विलयन (साल्यूशन) का निर्माण करता है

 

परासरण (ऑसमोसिस) का कारण

परासरण (ऑसमोसिस) दो क्षेत्रों में विलायक (साल्वेंट) अणु की मुक्त ऊर्जा की वजह से होता है। विलयन (साल्यूशन) में मौजूद मुक्त् उर्जा की तुलना में शुद्ध पानी या विलायक (साल्वेंट) में ज्यादा मुक्त ऊर्जा होती है। इसलिए परासरण (ऑसमोसिस) के दौरान विलायक (साल्वेंट) या पानी अपनी मुक्त ऊर्जा के उच्च क्षेत्र से अपनी मुक्त ऊर्जा के निम्‍न क्षेत्र की ओर अर्धपारगम्य झिल्ली (मेम्बरेन) के माध्यम से होकर जाता है।

परासरण (ऑसमोसिस)  का महत्व

परासरण (ऑसमोसिस) पौधों और जंतुओं की कोशिकाओं में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। यह पोषक तत्वों के वितरण में और अपशिष्ट उत्पादों की निकासी में मदद करता है। पौधों और जंतुओं दोनों की जीवित कोशिकाएं एक अर्धपारगम्य झिल्ली (मेम्बरेन) से घिरी होती हैं। इसे कोशिका झिल्ली (मेम्बरेन) के रूप में जाना जाता है । यह झिल्ली (मेम्बरेन) कोशिका और उसके वातावरण के बीच एक चयनात्मक अवरोध का निर्माण करती है और वातावरण से विषाक्त पदार्थों को कोशिका  में प्रवेश नहीं करने देती है। चयनात्मक पारगम्यता से कोशिका,  कोशिका के अंदर और बाहर आवश्यक पदार्थों का प्रवाह नियंत्रित करती है। पौधों में परासरण (ऑसमोसिस) जड़ों की अर्धपारगम्य झिल्ली(मेम्बरेन) का उपयोग करके मिट्टी से पानी और खनिजों का अवशोषण भी करता है।

विलयनों (साल्यूशनों) के प्रकार

अल्पपरासारी विलयन (हाइपोटॉनिक साल्यूशन)

ये कम विलेय (सॉल्यूट) स्तर वाले सॉल्यूशन (विलयन) होते हैं।

अतिपरासारी विलयन (हाइपरटॉनिक साल्यूशन)

उच्च विलेय (सॉल्यूट) स्तर वाले अतिपरासारी विलयन (हाइपरटॉनिक साल्यूशन) के रूप में जाने जाते हैं।

समपरासारी विलयन (आइसोटोनिक साल्यूशन)

अगर दोनों विलयन (साल्यूशन) में विलेय (साल्यूट) की सांद्रता की मात्रा समान है, तो इन्हे समपरासरी विलयन (आइसोटॉनिक साल्यूशन) के रूप में जाना जाता है।

अलग-अलग विलयन (साल्यूशन) के प्रकार में परासरण (ऑसमोसिस)  का होना

अल्पपरासारी  विलयन (हाइपोटॉनिक साल्यूशन)

अगर हम जीवित कोशिकाएं  अल्पपरासारी  विलयन (हाइपोटॉनिक साल्यूशन) में रखते हैं तो कोशिका  में मौजूद पानी की तुलना में पानी की उच्च सांद्रता के कारण पानी कोशिका के अंदर जाता है। तब कोशिका  फूलकर सूज जाती है।

अतिपरासारी  विलयन (हाइपरटॉनिक साल्यूशन)

अगर हम जीवित कोशिकाएं अतिपरासारी विलयन (हाइपोटॉनिक साल्यूशन) में रखते हैं तो कोशिका  में मौजूद पानी की तुलना में पानी की कम सांद्रता के कारण पानी कोशिका से बाहर निकल जाता है। तब कोशिका  सिकुड़ जाती और पलैमोलाइज्ड हो जाती है।

समपरासारी  विलयन (आइसोटोनिक साल्यूशन)

अगर हम जीवित कोशिकाएं समपरासारी विलयन (आइसोटोनिक साल्यूशन) में रखते हैं तो यह दोनों ओर पानी की बराबर सांद्रता के कारण कोई भी बदलाव नहीं दिखाएगा। कोशिका जैसे होती है वैसी ही बनी रहती है।

 

परासरण (ऑसमोसिस)  की परिघटना का प्रदर्शन ऑस्मोमीटर का उपयोग करके किया जा सकता है। यह परासरण (ऑसमोसिस) की प्रक्रिया का प्रदर्शन करने वाला एक उपकरण है।

सीखने के परिणाम

  • छात्र परासरण (ऑसमोसिस) की अवधारणा समझते हैं।
  • छात्र परासरण (ऑसमोसिस) का कारण समझते हैं।
  • छात्र पादप और जंतु कोशिकाओं में परासरण (ऑसमोसिस) का महत्व समझते हैं।
  • एक बार जब छात्र एनीमेशन और सिमुलेशन के माध्यम से चरणों को समझ लेंगें तो वे वास्तविक प्रयोगशाला में और ज्यादा सही ढंग से प्रयोग करने में सक्षम हो जाएंगे।

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